पेरिटोनियल डायलिसिस: अर्थ ,प्रकार, प्रक्रिया, नुकसान-फायदे, जटिलता

पेरिटोनियल डायलिसिस क्या है (what is Peritoneal dialysis), यह किडनी की विफलता के दौरान इलाज के रूप में प्रयोग की जाने वाली एक प्रक्रिया है। जब हमारी किडनी बेकार पदार्थों को छानकर शरीर से बाहर निकालने की क्षमता खो देती है या कम होती है, तो विशेषज्ञ डायलिसिस की सलाह दे सकता है। आमतौर पर डायलिसिस दो प्रकार की होती है, हीमोडायलिसिस (hemodialysis) और पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal dialysis)। आपके मामले में कौन सी डायलिसिस की जरूरत है यह विशेषज्ञ आपकी स्वास्थ्य स्थिति, रोग की गंभीरता और बीमारी को भांपकर तय करता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पेरिटोनियल डायलिसिस होम (घर) डायलिसिस का एक प्रकार है। इस प्रक्रिया को अस्पताल में प्रारंभिक प्रशिक्षण लेने के बाद, घर पर ही पूरा किया जा सकता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal dialysis), डायलिसिस की वह प्रक्रिया है जिसमें प्रत्यक्ष रूप से पेट के निचले हिस्से में सर्जरी के माध्यम से एक नली डालकर बेकार पदार्थों को बाहर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान, एक तरह का खास तरल पदार्थ जिसे डायलीसेट कहते हैं वह उसे कैथेटर के माध्यम से पेट में डालकर कुछ घंटों तक पेट में ही रखा जाता है। इस समय में डायलेसेट बेकार पदार्थों को पेट से सोख लेता है और उसके बाद डायलिसेट को पेट से बाहर निकाल लिया जाता है। इस प्रक्रिया में प्रतिदिन तीन से चार बार दोहराया जाता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस के प्रकार हैं –

निरंतर चलने वाला पेरिटोनियल डायलिसिस ( Continuous ambulatory peritoneal dialysis, CAPD)

इस विधि के लिए मशीन की जरूरत नहीं होती है। यह सरल प्रक्रिया है इसे घर, दफ्तर तथा स्कूल जैसी जगह पर भी पूरा किया जा सकता है। इसके अलावा इसे ऐसे मरीजो के लिए अपनाया जाता है जो बाहर आ-जा नहीं सकते। यह प्रणाली दिल के लिए अनुकूल होती है।

स्वचालित पेरिटोनियल डायलिसिस (Automated Peritoneal Dialysis)

पेरिटोनियल डायलिसिस के इस प्रकार में मशीन द्वारा काम होता है, जब आप सोने के लिए तैयार हो जब इस मशीन को लगाया जाता है और लगभग 8 से 10 घंटे बाद यानि अहले दिन इसे हटा दिया जाता है। यह एक ऑटोमेटिक मशीन होती है, आप सो रहे होते हैं और यह अपना काम कर रहा होता है।

क्या होती है पेरिटोनियल डालिसिस कैथेटर, और इसकी क्या जरूरत होती है-

पेरिटोनियल डालिसिस कैथेटर, इस डायलिसिस प्रक्रिया को दोहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह एक मुलामयम प्लास्टिक की पेंसिल के आकार की मोटी नली होती है। इसे शरीर के बेकार पदार्थों को बाहर निकालने के लिए इस्तेमाल किया है। कैथेटर के माध्यम से ही डायलेसेट नामक द्रव पेट के निचले हिस्से में डाला जाता है, और जब यह द्रव अंदर के सारे बेकार पदार्थों को सोख लेता है तो कैथेटर से डायलेसेट बाहर निकाला जाता है।

कैसे लगाया जाता है पेरिटोनियल डालिसिस कैथेटर

पेरिटोनियल डालिसिस कैथेटर, विशेषज्ञ सर्जरी के माध्यम से लगाता है।सर्जरी से पहले आपको सामान्य बेहोशी दी जा सकती है जिससे दर्द महसूस न हो। कैथेटर डालने से पहले स्कैनर से देखा जाएगा कि मूत्राशय खाली है या नहीं, यदि नहीं तो उसे मूत्रनलिका द्वारा खाली किया जाएगा।

उसके बाद नाभि के निचले हिस्से जहाँ कैथेटर डालना है, उसे साफ किया जाएगा और वहाँ 1 या 2 सेंटिमीटर का चीरा लगाकर कैथेटर को पेट के अंदर डाला जाएगा। घाव को टांकों के साथ बंद कर दिया गया है। चीरे के घाव को ठीक करने और कैथेटर को उसके स्थान पर सेट होने के लिए लगभग 2 हफ्ते का समय लगता है। इस प्रक्रिया के बाद पेरिटोनियल डायलिसिस दो सप्ताह के बाद शुरू किया जाता है। इस प्रकिया में लगभग 45 मिनट का समय लग सकता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया चरणों में

पेरिटोनियल डालिसिस की प्रक्रिया को साधारण चरणों में समझा जा सकता है। पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया को करने के लिए रोगी को 2 से 3 दिन तक प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती किया जाता है।

अगर मरीज़ खुद करे तो सब से बेहतर ह।  लेकिन अगर किसी कारण से वह खुद नहीं कर सकते तो किसी और को प्रशिक्षण दिया जाता है। 

चरण-1

पहले चरण में पेरिटोनियल डालिसिस कैथेटर को सर्जरी के माध्यम से पेट में लगाया जाता है। फिर इस कैथेटर के जरिए डायलेसेट नामक द्रव को पेट में भरा जाता है। डायलेसेट 2 लीटर के पैकट के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। फिर यही डायलेसेट कैथेटर के माध्यम से पेट में डाला जाता है। डायलेसेट की इस थैली को पेट में खाली होने में 10 से 20 मिनट का समय लगता है।

चरण-2

दूसरे चरण में ट्यूबिंग बंद होने के बाद डायलेसेट को पेट में 3 से 12 घंटों के लिए छोड़ दिया जाता है। इन घंटों में यह डायलेसेट पेट के रक्त से सारे बेकार पदार्थों को सोख लेता है।

चरण-3

तीरसे चरण में पेट में लगी हुई उसी कैथेटर के माध्यम से डले हुए डायलेसेट को बाहर निकाला जाता है। प्रक्रिया के बाद जब डायलेसेट बाहर आता है, तो उसका रंग पीला हो चुका होता है। पेट से डायलेसेट को बाहर निकालने में 10 से 20 मिनट लग जाते हैं।

चरण-4

चौथे चरण में पहले डाले गए डायलेसेट को बाहर निकालने के बाद, एक दूसरा 2 लीटर का डायसेलेट फिर से पेट में डाला जाता है। यह प्रक्रिया दिन में 3-4 बार दोहरायी जाती है।

क्या हैं पेरिटोनियल डायलिसिस के फायदे और नुकसान

डायलिसिस की इस प्रक्रिया के साथ कुछ फायदे और नुकसान भी जुड़े हैं। क्या हैं वे फायदे और नुकसान जानिए-

पेरिटोनियल डालिसिस के फायदेपेरिटोनियल डालिसिस के नुकसान
निरंतर रूप से प्रकृतिक किडनी की तरह काम करता है।रोजाना करवाने की जरूरत होती है।  
आहार संबंधी प्रतिबंध कम होते हैं।एक स्थाई कैथेटर की हमेशा जरूरत होती है।
आपके घर या आपके हिसाब से अनुकूल स्थान पर प्रक्रिया की जा सकती है।मोटापा बढ़ने की आशंका रहती है।
सोते समय भी प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।मोटे लोगों में ज्यादा बार प्रक्रिया की जरूरत होती है।
यात्रा करने पर कोई रोक नहीं होती।मशीन की जानकारी और जिम्मेदारी की जिम्मा आपका होता है।
आपकी मर्जी से संपन्न होने वाली प्रक्रिया 

पेरिटोनियल डायलिसिस और हीमोडायलिसिस में अंतर

पेरिटोनियल डालिसिस की अपेक्षा लोगों ने हीमोडायलिसिस को अधिक असुविधाजनक माना है। दरअसल हीमोडायलिसिस में शरीर से खराब (बेकार पदार्थ युक्त) रक्त निकाला जाता है और फिर उसे नकली किडनी (Artificial kidney, hemodialyzer) के माध्यम से साफ करके वापस शरीर में पहुँचाया जाता है।

लेकिन इस आसान सी लगने वाली प्रक्रिया में कई जटिलताएँ हैं जैसे, डायलिसिस में रक्त को साफ करने के लिए शरीर में से रक्त 200 से 400 मिली. प्रतिमिनट के हिसाब से निकाला जाता है। इसका प्रवाह इतना होता है कि हाथ या पैरों की नसों से नहीं निकाला जा सकता इसलिए पहले डॉक्टर मरीज की सर्जरी करके एक प्रवेश द्वार (entrance point) बनाता है जिसे vascular access भी कहा जाता है। ये प्रवेश द्वार सामान्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं- एवी फिस्टूला, एवी ग्राफ्ट और वस्कूलर एक्सस कैथेटर।

इस हिसाब से पेरिटोनियल डालिसिस और हीमोडायलिसिस में बहुत अंतर हैं जानिए-

पेरिटोनियल डालिसिसहीमोडायलिसिस
निरंतर रूप से प्रकृतिक किडनी की तरह काम करता है। हेमोडायलिसिस की तुलना में सौम्य और आसान प्रक्रिया।  हफ्ते में 3 बार चार घंटे की प्रक्रिया, और शरीर पर ज्यादा दबाव।
आहार संबंधी प्रतिबंध कम होते हैं।आहार संबंधी ज्यादा प्रतिबंध।
 स्थान पर प्रक्रिया की जा सकती है।सेंटर जाना।
सोते समय भी प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।प्रक्रिया के लिए जागे रहना जरूरी।
यात्रा करने पर कोई रोक नहीं होती।अपने डायलिसिस सत्रों के चलते इच्छानुसार यात्रा नहीं कर सकते।

पेरिटोनियल डायलिसिस को लेकर जटिलताएँ

संक्रमण-

पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया के चलते पेट के निचले हिस्से में संक्रमण होना सामान्य बात है। इसके अलावा कैथेटर प्रत्यारोपित होने वाले चीरे में भी बराबार संक्रमण का खतरा रहता है। प्रक्रिया में संक्रमण का खतरा ब ज्यादा बढ़ जाता है जब डायलिसिस करने वाला सही से प्रक्रिया के बारे में न जानता हो।

वजन बढ़ना-

पेरिटोनियल डायलिसिस में उपयोग किए जाने वाले डायलेसेट द्रव में कुछ मात्रा मे शुगर होती है, जो रोजाना डायलिसिस के दौरान आपको सैकड़ों कैलोरी दे सकती है, जिसके परिणाम से आपका वजन बढ़ने के साथ शरीर में शुगर का स्तर बढ़ने का भी खतरा रहता है।

हर्निया-

पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया में डायलेसेट कई घंटों के लिए पेट में छोड़ा जाता है, जिसके परिणाम से आपकी मासपेशियों में खिंचाव आ जाने से हर्निया जैसी समस्या आ सकती है।

उच्च रक्त चाप और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने की भी आशंका रहती है।

पेरिटोनियल डायलिसिस इन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है-

  • ज्यादा छोटे बच्चों के लिए पेरिटोनियल डायलिसिस बेहतर विकल्प है क्योंकि, उनके लिए हीमोडायलिसिस तकनीकी रूप से ज्यादा कठिन होती है।
  • बच्चों के लिए पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया को स्कूल में भी संपन्न किया जा सकता है।
  • कामगार लोगों के लिए भी यह एक आरामदायी प्रक्रिया है क्योंकि यह दफ्तर में भी पूरी की जा सकती है।
  • ऐसे मरीज जो किसी कारण के चलते बिस्तर पर हों और जो हफ्ते में 3 दिन बाहर आने में असमर्थ हों, उनके लिए पेरिटोनियल डायलिसिस बेहतर विकल्प होता है।

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