किडनी की समस्याएं: बीमारियां, जाँच, इत्यादि

किडनी की समस्याएं आज कल बहुत आम हो चुके हैं।जीवन को सुख से यापन करने के लिए हमारे शरीर और उसके अंग हमारी बहुत मदद करते हैं। इन अंगो में दिल, फेफड़े, लीवर, दिमाग और मुख्य रूप से किडनी काम करती है। किडनी हमारे शरीर में खराब पदार्थों को अलग करके उन्हें मूत्र के माध्यम से शरीर के बाहर निकाल देती है, इसलिए किडनी को ठीक रखने के लिए हमें किडनी की बीमारियां: लक्षण, कारण, जाँच और इलाज को जानने की जरूरीत होती है।

अगर यही महत्वपूर्ण अंग यानि हमारी किडनी किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं या उनकी कार्यक्षमता कम हो जाती है, तो इसका कारण कोई बीमारी या संक्रमण हो सकता है। किडनी की बीमारियों से आज के समय में लाखों लोग ग्रसित हैं और डायलिसिस जैसे प्रक्रियाओं के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं।

क्या किडनी में होने वाली वे सभी किडनी की समस्याएं/ बीमारियाँ जानिए विस्तार से-

हमारी किडनी शरीर में सबसे मजबूत अंग के रूप में कार्य करती है यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि जब तक किडनियाँ 70-80 प्रतिशत खराब न हो तब तक आपको पता नहीं चलने देती। लेकिन जब किडनी खराब होने लगती हैं तो आपको कुछ संकेत देती हैं ये संकेत उन्हीं रोगों से संबंधित होते हैं जिनसे वह जूझना शुरु कर चुकी हों।

1. अल्पकालीन किडनी विफलता (एक्यूट किडनी इंज्यूरी, AKI)

ये ऐसे रोग होते हैं जिनकी वजह से किडनी की कार्यक्षमता में अचानक कमी या नुकसान हो जाता है। ये रोग किसी इंफेक्शन, बैक्टीरिया आदि या फिर किसी सर्जरी के बाद उत्पन्न हो जाते हैं। इन रोगों को सामान्य इलाज से ठीक किया जा सकता है, लेकिन समय पर सही इलाज न करना भी इसमें गंभीर स्थिति को जन्म दे सकता है। किडनी में AKI जैसा रोग होने से पहले अगर मरीज पूरी तरह स्वस्थ था, तो AKI के इलाज केबाद मरीज की किडनी स्वस्थ हो जाती हैं।

क्या होते हैं AKI के कारण

  • उच्च रक्त चाप (High blood pressure)
  • मधुमेह (diabetes)
  • किडनी में परयाप्त मात्रा में रक्त का न पहुँचना।
  • किडनी में अचानक कोई चोट या समस्या।
  • मूत्रवाहिनियों (जो किडनी से मूत्र को मूत्राशय कर ले जाती हैं) में कोई रकावट या संक्रमण
  • उल्टी-दस्त के कारण शरीर में अचानक पानी की कमी आ जाना
  • किडनी का संक्रमणजैसेपायलोनेफ्राइटिस (pyelonephritis)
  • अन्य संक्रमण जैसे- मलेरिया, डेंगू, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), सेप्सिस (sepsis) आदि

 क्या होते हैं AKI के लक्षण

  • पेशाब आना कम या बंद हो जाना
  • कमजोरी और थकान महसूस होना
  • पैरों में और शरीर के अन्य हिस्सों में सूजन आना
  • सांस फूलना या सांस आने में परेशानी होना
  • सीने में दर्द या दबाव महसूस होना
  • रक्त में पोटाशियम की मात्रा का बढ़ना
  • भूख कम लगना, उल्टी आना

2. दीर्घकालीन किडनी विफलता (क्रोनिक किडनी डिजीज, CKD)

क्रोनिक किडनी डिसीज उन रोगों को कहा जाता है जोमहीनों या सालों से किडनी की कार्यक्षमता में धीरे-धीरे बदलाव या नुकसान करते आए हों। इसमें किडनी की काम करने की क्षमता धीरे- धीरे लगातार कम होती जाती है। लंबे समय के बाद, किडनी लगभग पूरी तरह से काम करना बंद कर देती हैं जिसे किडनी फेल होना या किडनी फेल्यर कहा जाता है। बीमारी का यह चरण जीवन के लिए खतरनाक हो जाता है इस कारण इसे एण्ड स्टेज किडनी डिजीज या ई.एस.के.डी. भी कहा जाता है।

इस रोग को eGFR नामक परीक्षण से हल्के, मध्यम या गंभीर रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। CKD के पाँच चरण होते हैं, इसका पाँचवां चरण जीवन के लिए खतरनाक है क्योंकि इसमें आकर मरीज को डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। अगर डायलिसिस या प्रत्यारोपण न हो तो एक समय ऐसा आता है जब मरीज की दोनों किडनी सिकुड़कर एकदम छोटी हो जाती है और काम करना बंद कर देती है।जिसे किसी भी दवा, ऑपरेशन से भी ठीक नहीं किया जा सकता है।

क्या होते हैं CKD के कारण

  • उच्च रक्त चाप (High blood pressure)
  • मधुमेह (diabetes)
  • परिवार में किसी को CKD होना (वंशानुगत रोग)
  • किडनी के किसी संक्रमण या पथरी आदि जैसी बीमारी में लापरवाही करना
  • लंबे समय से दवाइयाँ (pain-killers) लेना
  • दिल संबंधी बीमारी
  • इनके अलावा ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस (glomerulonephritis) और लूपस (lupus) आदि जैसे रोग भी CKD का कारण हो सकते हैं।

क्या होते हैं CKD के लक्षण

  • शरीर में खुजली होना
  • मासपेशियों में ऐंठन या दर्द होना
  • खाने का मन न होना, उल्टी याउबकाई आना।
  • पैरों के निचले हिस्से में सूजन आना।
  • पेशाब संबंधी आदतों में बदलाव, पहले से ज्यादा या बहुत ही कम आना।
  • सांस लेने में परेशानी होना
  • नींद कम आना
  • सामान्य लक्षणों के साथ-साथ CKD के अन्य लक्षण उसके चरण पर निर्भर करते हैं, जो भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

3. पेशाब का संक्रमण (UTI)

UTI यानि यूरिनरी ट्रैक्ट इंफैक्शन जो आंत से आने वाले, ई-कोली नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। यह संक्रमण अधिकतर महिलाओं में देखने को मिलता है और पुरुषों में इससे संक्रमित होने की दर सामान्यत: कम ही रहती है। इसका कारण है महिलाओं और पुरुषों के मूत्रमार्गों में भिन्नता। यह सामान्य तौर पर मूत्रमार्ग से मूत्राशय में प्रवेश कर जाता हैं। इसके अलावा इससे स्थिति उस समय गंभीर हो जाती है जब या मूत्रवाहिनियों से होकर किडनी में प्रवेश कर जाता है।

क्या होते हैं UTI के कारण

  • पुरुषों (20 सेमी) की तुलना में महिलाओं में मूत्रमार्ग (4 सेमी) कम होता है, इसलिए बैक्टीरिया मूत्राशय तक अधिक आसानी से पहुंचते हैं। इसलिए, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में UTI आम है।
  • असुरक्षित यौन संबंधों से भी बैक्टीरिया आपके मूत्रमार्ग या ब्लैडर में प्रवेश कर सकता है।
  • कुछ महिलाओं को उनके अनुवांशिक मामलों के चलते UTI होने की अधिक संभावना होती है।
  • मधुमेह (diabetes) से पीड़ित महिलाओं और पुरुषों को UTI होने का खतरा अधिक होता है, क्योंकि इनकी प्रतिरक्षा प्रणाली (immune systems) कमजोर होता है और बैक्टीरिया से लड़ने में मदद नहीं कर पाता।
  • पुरुषों की बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथी मूत्राशय में पेशाब को रोक सकती है जिससे यह संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।

क्या होते हैंUTI के लक्षण

  • पेशाब करने में बहुत जलन और दर्द होना
  • बार-बार पेशाब जाने की तीव्र इच्छा होना लेकिन जाने पर बहुत कम मात्रा में पेशाब आना
  • पेशाब का रंग बदल जाना, कोला या चाय की तरह होना
  • पेशाब में खून या पस आना
  • पेशाब में दुर्गंध (odor) आना
  • महिलाओं के पेल्विस (pelvic) में दर्द होना
  • पुरुषों के मलाश्य में दर्द होना
  • पहले की अपेक्षा पेशाब में गाढ़ापन आ जाना

4. नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम

नेफ्रोटिक सिंड्रोम किडनी का वह आमरोग है जिसमें मरीज का प्रोटीन अधिक मात्रा में मूत्र की राह बाहर निकलने लगता है। हमारी किडनी में जो खून को साफ करने और ज्यादा पानी का संतुलन बनाने वाली रक्त वाहिकाएँ होती हैं उनमें क्षति हो जाने के कारण नेफ्रोटिक सिंड्रोम होता है। किडनी में होने वाला यह रोग अन्य उम्र के लोगों की तुलना में बच्चों में अधिक देखने को मिलता है। यह रोग दवाओं और इलाज से ठीक होने के बाद भी बार-बार मरीज के शरीर में लौटकर आ सकता है। हालांकि पेशाब में प्रोटीन का रिसाव मुख्य समस्या है। इससेकिडनी की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है।वर्षों या दशकों में यह किडनी की विफलता (kidney failure)का कारण भी बन सकता है।

क्या होते हैं नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण

  • नेफ्रोटिक सिंड्रोम आमतौर पर किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं (ग्लोमेरुली) के समूहों को नुकसान पहुँचने के कारण होता है।
  • मधुमेह (diabetes)ग्लोमेरुली को प्रभावित करती है, मधुमेह ज्यादातर बड़ी उम्र के लोगों में नेफ्रोटिक सिंड्रोम का कारण बनता है।

क्या होते हैं नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के लक्षण

  • आँखों के आस-पास और शरीर के अन्य हिस्सों में सूजन आ जाना
  • मूत्र में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण पेशाब झागदार आना
  • शरीर में पानी की मात्रा ज्यादा होने का कारण वजन बढ़ जाना
  • भूख न लगना और थकान रहना
  • पेट फूल जाना और पेशाब कम आना
  • रक्त में कोलेस्ट्रॉल (cholesterol) का बढ़ना

5. पोलिसिस्टिक किडनी डिजीज (PKD)

पोलिसिस्टिक किडनी डिजीज (पी. के. डी.)वंशानुगत किडनी रोग होता है। इस रोग में मुख्य असर किडनी पर होता है। रोगी की दोनों किडनियों में बड़ी मात्रा में सिस्ट (पानी से भरे बुलबुले) जैसी रचना बन जाती हैं।ये सिस्ट किडनी के आकार को बढ़ा देते हैं और किडनी के उन ऊतकों (tissue) को क्षतिग्रस्त कर देते हैं जिनसे किडनी बनी हुई है। पोलिसिस्टिक किडनी डिजीज को क्रोनिक किडनी फेल्यर का मुख्य कारण है। किडनी के अलावा कई मरीजों में ऐसी सिस्ट लीवर, तिल्ली, ऑतों और दिमाग की नली में भी दिखाई देती हैं।

क्या होते हैं PKD के कारण

  • चूंकि PKD एक वंशानुगत बीमारी है तो इसका मरीज आम तौर पर जन्म से ही इससे ग्रसित हो जाता है।
  • इस बीमारी के लक्षण मरीज में लंबे समय के बाद देखने को मिलते हैं, कभी-कभी लक्षण 60-70 की उम्र में जाकर दिखाई देते हैं।

क्या होते हैं PKD के लक्षण

  • रक्तचाप में वृद्धि होना
  • पेट में दर्द, पेट में गाँठ और पेट बढ़ जाना
  • पेशाब में खून आना
  • रोग के बढ़ने के साथ-साथ CKD के लक्षण दिखने लगना
  • पेशाब में बार-बार संक्रमण होना

6. ग्लोमेरूलोनेफ्राटिस (GN)

इस रोग में किडनी के ग्लोमेरूली में सूजन (Inflammation of glomeruli) आ जाती है, ग्लोमेरूली किडनी की बेहद जरूरी इकाई होती है जो सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं का एक गुच्छा होती है। ये रक्त को साफ करने में और बेकार पदार्थों को पेशाब के मध्यम से बाहर निकालने का काम करती हैं। ग्लोमेरूलोनेफ्राटिस रोग में ग्लोमेरूली क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और काम करना बंद कर देती हैं। जिसकी वजह से किडनी फेल्यर का खतरा बढ़ जाता है।

क्या होते हैं ग्लोमेरूलोनेफ्राटिस (GN) के कारण

  • गले की खराश जो स्ट्रेप्टोकोकी (streptococci) बैक्टीरिया के कारण हाती है 2 या 3 हफ्तों में GN बन सकती है।
  • ल्यूपस (Lupus), आईजीए नेफ्रोपैथी (IGA nephropathy) , जैसे कारक GN का महत्वपूर्ण कारण हैं।
  • इनके अलावा कुछ ऑटोइम्यून रोग GN पैदा कर सकते हैं।

क्या होते हैं ग्लोमेरूलोनेफ्राटिस (GN) के लक्षण

ग्लोमेरूलोनेफ्राटिस के लक्षण

  • पेशाब में प्रोटीन और खून का आना
  • उच्च रक्त चाप (High blood pressure)
  • पैरों और शरीर के अन्य हिस्सों में सूजन आना
  • रात में सामान्य से ज्यादा पेशाब आना
  • झागदार पेशाब आना
  • यह रोग किडनी विफलता का कारण भी बन सकता है

7. किडनी में पथरी

किडनी मूत्र बनाने के लिए रक्त से बेकार और तरल पदार्थ निकालती हैं। ज्यादातर किडनी में कैल्शियम के जमाव के कारण पथरी बन जाती हैं। पथरी एक महत्वपूर्ण किडनी रोग है। सामान्यतः पथरी किडनी, मूत्रवाहिनी और मूत्राशय में कहीं भी हो सकती है। पुरुषों में महिलाओं के मुकाबले किडनी की पथरी की समस्या अधिक देखने को मिलती है।

किडनी में पथरी होने के कारण

  • किडनी में पथरी होने की ज्यादा संभावना तब होती है जब आपको पहले भी पथरी हुई हो।
  • परिवार में किसी को किडनी की पथरी हो
  • पानी कम पीते हों
  • भोजन में आप प्रोटीन, सोडियम और / या शक्कर ज्यादा लेते हों
  • आपका वजन ज्यादा हो
  • आपकी कोई गैस्ट्रिक बायपास सर्जरी या आंतों की सर्जरी हुई हो

किडनी में पथरी होने के लक्षण

  • पेशाब करते समय दर्द होना
  • पेशाब में खून आना
  • पीठ के निचले हिस्से में तेज दर्द होना
  • मितली और उल्टी आना

इसके आलावा पथरी के जिन मरीजों को इस तरह के लक्षण नहीं दिखाई देते तोउसे “साइलेन्ट स्टोन” (Silent stone) कहते हैं। इस तरह किडनी की पथरी बिना किसी लक्षण के सालों रह सकती है।

8. प्रोस्टेट की बीमारी – बी. पी. एच

प्रोस्टेट की बीमारी भी किडनी से ही संबंधित होती है, प्रोस्टेट ग्रंथी केवल पुरूषों में होती है। यह मूत्राशय के नीचे स्थित होती है। पुरुषों की 50 साल की उम्र के बाद प्रोस्टेट ग्रंथी का आकर बढ़ने लगता है इसी कारण मूत्रनलिका पर दबाव आता है। इसे बी. पी. एच. (बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरट्रोफी) कहते है।

प्रोस्टेट की बीमारी –(B. P. H)के कारण

B. P. H (प्रोस्टेट) बीमारी होने का एक मात्र कारण उम्र का बढ़ना होता है। यह मुख्य तौर पर 50 साल से ज्यादा के पुरुषों में अधिक होती है।

प्रोस्टेट की बीमारी – (B. P. H)के लक्षण

  • बार-बार पोशाब करने की तीव्र इच्छा होना
  • रात में ज्यादा पेशाब आना
  • पेशाब करने में परेशानी होना
  • पेशाब की धारा कमजोर हो जाना, कभी रुकना कभी आना
  • पेशाब के अंत में पेशाब टपकना
  • मरीज को पूरी तरह मूत्राशय को खाली करने में असमर्थ होना
  • पेशाब मे खून आना

किडनी के रोगों को पहचानने के लिए कराए जाने वाले परीक्षण

यूरिनलिसिस (urinalysis)-

इस परीक्षण के माध्यम से मरीज के पेशाब में प्रोटीन है या नहीं इस बात का पता लगाया जाता है। पेशाब में प्रोटीन का आना किडनी की कई बीमारियों और संक्रमणों का कारण होता है।

सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट (Serum creatinine test)-

यह परीक्षण यह बताता है कि रक्त में क्रिएटिनिन की मात्रा कितनी है। किडनी आमतौर पर रक्त से क्रिएटिनिन को पूरी तरह से छान लेती हैं। जब किडनी की कार्यक्षमता में कमी ने से इसकी मात्रा रक्त में बढ़ जाती है जो किडनी स संबंधित कई रोगों का कारण होती है।

रक्त यूरिया नाइट्रोजन (BUN)-

रक्त यूरिया नाइट्रोजन (BUN) परीक्षण रक्त में बेकार उत्पादों और उनकी मात्रा की जाँच करता है। BUN परीक्षण रक्त में नाइट्रोजन की मात्रा को मापते हैं। यूरिया नाइट्रोजन प्रोटीन का ही एक भाग होता है।

eGFR परीक्षण-

इस परीक्षण के माध्यम से पता लगाया जाता है कि किडनी के बेकार पदार्थों को छानने की गति क्या है। यह परीक्षण मरीज के वजन, लंबाई, लिंग, रंग, और उम्र जैसे कारकों के आधार पर किया जाता है। यह परीक्षण CKD के मरीजों में इस बीमारी के चरण को पहचानने के लिए किया जाता है।

युरिन कल्चर परीक्षण-

यह परीक्षण आम तौर पर मूत्रप्रणाली के संक्रमण के कारक यानि बैक्टीरिया को पचानने के लिए किया जाता है। इस जाँच की रिपोर्ट 48 घंटों में आती हैं।

कैसे होता है सभी रोगों का इलाज

सभी  किडनी की बीमारियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं ऐसे में जाहिर है कि प्रत्येक मरीज भी भिन्न होगा। मरीज की भिन्नता उसकी उम्र, लिंग, लंबाई, वजन और प्रतिरक्षा प्रणाली जैसे अनेक करकों पर निर्भर करते हैं। ऐसे में किसी भी अन्य मरीज (जिसे आप जैसी बीमारी हो) से सलाह न लें और न ही उसके इलाज को अपनाएँ।

अपनी बीमारी और किडनी की सभी समस्याओं के उचित निदान के लिए किडनी विशेषज्ञ (Nephrologist) से मिलें और उसी  परामर्श से अपने लिए बने उचित इलाज का ही पालन करें। किसी नीम हकीम से सलाह लेने से बचें।

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