किडनी संक्रमण(infection) : कारण, लक्षण, इलाज, टेस्ट

किडनी हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है, जिस तरह यह हमारे शरीर को चलाने में हमारा साथ देती है। उसी तरह हमें भी किडनी को, किडनी संक्रमण या बीमारियों आदि से बचाने की कोशिश करनी चाहिए। किडनी जितनी मजबूती से शरीर में अपना काम करती है उतनी ही मजबूती से बीमारियों से लड़ती भी रहती है।

UTI (मूत्राशय का संक्रमण) अन्य संक्रमणों में से 25 प्रतिशत ज्यादा होने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। लगभग 50 से 60 प्रतिशत महिलाएँ अपने जीवनकाल में UTI से संक्रमित होती हैं। UTI पुरुषों की तुलना में महिलाओं में 8:1 के अनुपात में ज्यादा बार होता है।

किडनी में होने वाली कई बीमारियों में से एक होता है किडनी संक्रमण। आम तौर पर यह तब होता है यह संक्रमण तब होता है जब मूत्राशय के संक्रमण के कारण बैक्टीरिया मूत्रवाहिनियों (ureter) के माध्यम से किडनी में प्रवेश कर जाता है। आमतौर पर यह संक्रमण भी UTI (urinary tract infection) का ही रूप होता है। इस संक्रमण को पायलोनेफ्राइटिस (pyelonephritis) कहा जाता है। यह सिस्टिटिस (bladder का संक्रमण) से भी ज्यादा गंभीर होता है।

इससे मरीज को अस्वस्थता जरूर महसूस होती है साथ यह भी खतरा होता है  कि रक्त के जरिए संक्रमण शरीर के अन्य अंगो में न फैल जाए। इसके अलावा अगर किडनी संक्रमण का इलाज समय पर नहीं कराया जाए तो यह CKD (Chronic kidney disease) का कारण भी बन सकता है साथ ही जीवन पर भी भारी पड़ सकता है।

किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के लक्षण-

शरीर के किसी भी अंग में कोई रुकावट या परेशानी आने पर अंग हमें लक्षणों से संकेत देता है। इसी तरह किडनी के संक्रमण के क्या हैं लक्षण जानिए-

  • पेशाब में खून और पस आना
  • ठंड के साथ तेज बुखार (103-104 डिग्री.)
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द (जहाँ किडनी होती हैं)
  • बार-बार पेशाब आना
  • भूख न लगना
  • पेशाब की तीव्र इच्छा होना लेकिन जाने पर पेशाब बहुत ही कम आना
  • मतली और उल्टी आना
  • पेशाब में तेज गंध आना
  • कमजोरी और थकान महसूस होना
  • अगर संक्रमण तीव्र होता है तो किडनी विफलता भी हो सकती है ।

बच्चों में किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के लक्षण-

  • सुस्ती आ जाना या ऊर्जा में कमी आ जाना
  • चिड़चिड़ापन और बुखार आना
  • भूख कम लगना और उल्टी आना
  • पेट में दर्द होना
  • बच्चों में बढ़वार का रुक जाना
  • पेशाब में तेज गंध आना और पेशाब में खून आना

इस तरह के लक्षण अगर आपको दिखाई दें तो तुरंत विशेषज्ञ को दिखाएँ। इसके अलावा अगर आपका UTI का इलाज पहले से चल रहा है और उससे आपको आराम नहीं मिल पा रहा है तो संभव है कि आपको किडनी का संक्रमण हो ऐसे में आपको तुरंत विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए।

किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के कारण

किडनी का संक्रमण में आमतौर पर बड़ी आंत से आया बैक्टीरिया ई-कोली मूत्राशय से मूत्रवाहिनियों के माध्यम से किडनी में प्रवेश कर जाता है। इस संक्रमण का मुख्य कारण ई-कोली बैक्टीरिया को ही माना जाता है। यह संक्रमण कभी-कभी किसी किडनी की सर्जरी आदि से भी लग जाता है।

फंगी भी किडनी के संक्रमण का कारण बन जाता लेकिन यह बहुत ही कम लोगों में होता है। इस तरह का संक्रमण अधिकतर कमजोर प्रतिरक्षा (weakened immune systems) वाले लोगों में देखने को मिलता है। किसी सर्जरी या इलाज के दौरान मूत्र नली (urinary catheter) का इस्तेमाल भी संक्रमण का कारण हो सकता है। मूत्राशय की नसों में आई किसी प्रकार की क्षति भी किडनी के संक्रमण का कारण बन सकती है।

किसे ज्यादा रहता है किडनी के संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) का खतरा

  • पुरुषों (20सेमी.) की अपेक्षा महिलाओं (6सेमी.) का मूत्रमार्ग छोटा होता है इस कारण महिलाओं में बैक्टीरिया का प्रवाह तेज गति होता है। मूत्राशय का संक्रमण ज्यादा आसानी से किडनी तक पहुँच जाता है।
  • गर्भवती महिलाओं में अन्य महिलाओं की अपेक्षा किडनी के संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
  • मूत्रपथ में आई रुकावट जैसे किडनी की पथरी, मूत्रमार्ग की संरचना में असामान्यता या पुरुषों में बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथी।
  • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली (weakened immune systems) वाले बूढ़े लोगों में लोगों में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है।
  •  इसके अलावा उनमें जिनका मधुमेह और एचआईवी जैसी बीमारियों का इलाज चल रहा हो।

गर्भावस्था में किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस)

गर्भावस्था में महिलाओं को किडनी का संक्रमण होने का खतरा अन्य महिलाओं की अपेक्षा 2 गुणा अधिक होता है। इसका कारण है गर्भावस्था के दौरान आने वाले शारीरिक बदलाव जो उनकी मूत्र प्रणाली को प्रभावित करते हैं। सामान्य तौर पर मूत्रवाहिनियाँ मूत्र को किडनी से मूत्राशय तक ले जाती है जिसके बाद मूत्रमार्ग से मूत्र शरीर के बाहर निकल जाता है। लेकिन गर्भावस्था में गर्भाशय बड़ा हो जाता है जिससे मूत्रमार्ग छोटा हो जाता है और मूत्रप्रणाली में असामान्यता आ जाती है। जिससे मूत्र के माध्यम से बैक्टीरिया किडनी तक पहुँच जाता है।

गर्भावस्था के दौरान किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) का इलाज अन्य मरीजों के मुकाबले अलग और गंभीर होता है। क्योंकि इसमें मरीज के साथ-साथ आने वाली संतान के स्वस्थ्य का ध्यान रखना होता है। इसके साथ ही गर्भावस्था के 12वें या 16वें सप्ताह में युरिन कल्चर परीक्षण कराना चाहिए ताकि संक्रमण होने से पहले उसकी रोक-थाम की जा सके।

किडनी के संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के लिए किए जाने वाले परीक्षण

अगर आपको किडनी के संक्रमण के कोई लक्षण दिखाई देतें हैं और उन लक्षणों के आधार पर संक्रमण की पुष्टि करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम विशेषज्ञ से मिलें। बिना विशेषज्ञ की सलाह के कुछ भी करना मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकता है। संक्रमण की पुष्टि करने के लिए आपका विशेषज्ञ आपको कई प्रकार के परीक्षण कराने को कह सकता है। क्या होंगे वे परीक्षण जानिए-

युरीन कल्चर परीक्षण (urine culture test)-

इस परीक्षण के माध्यम से विशेषज्ञ यह पता लगाते हैं कि कौन से बैक्टीरिया के कारण संक्रमण हुआ है। साथ ही इसी परीक्षण के अनुसार ही आपके UTI में कौन सी दवाइयाँ या आंटीबायोटिक देनी है, विशेषज्ञ तय करते हैं।

यूरिया या क्रिएटिनिन परीक्षण-

किडनी क कार्यक्षमता में यूरिया और क्रिएटिनिन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रक्त में इनकी असीमित मात्रा किडनी रोग का कारण हो सकती है इसी कारण इनका परीक्षण किया जाता है।

युरिन माइक्रोस्कोपी परीक्षण (urine microscopy)-

इस परीक्षण को मूत्र में कई पदार्थों का पता लगाने या मापने के लिए किया जाता है। जैसे सामान्य और असामान्य चयापचय (metabolism), कोशिकाओं, सेलुलर टुकड़े (cellular fragments) और बैक्टीरिया।

अल्ट्रासाउंड- कंप्यूटराइज़्ड टोमोग्राफी (computerized tomography test)-

यह परीक्षण गुर्दे को गैर-इनवेसिव रूप से देखने में मदद करते हैं और रोग की गंभीरता के बारे में भी विचार देते हैं।

डिजिटल रेक्टल परीक्षा (Digital rectal exam)(पुरुषों के लिए)

इस परीक्षण को मुख्य तौर पर पुरुषों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें परीक्षण करने वाला चिकनी उँगली को मरीज की गुदा में डालता है, यह देखने के लिए की प्रोस्टेट ग्रंथी में सूजन तो नहीं है।

डाइमेर्कैप्टोसुकिनिक एसिड (DMSA) स्किंटिग्राफी (Dimercaptosuccinic acid scintigraphy)-

इस परीक्षण में रेडियोधर्मी किरणों के माध्यम से किडनी की केर्यक्षमता, क्षति या अन्य कोई परेशानी को जाँचा जाता है।

किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) का इलाज

किडनी के संक्रमण का इलाज मुख्य रूप से तीन तरह का होता है, जो संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करता है।

एंटीबायोटिक (antibiotics) दवाओं से इलाज

किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के इलाज के लिए आपका विशेषज्ञ संभव तौर पर आपको एंटीबायोटिक (antibiotics) दवाओं से ठीक करेगा। इन दावओं से आपका इलाज सामान्य तौर पर एक सप्ताह-तीन सप्ताह तक का चलता है। इलाज की शुरुआत इंजेक्शनों से की जाती है, उससे अगर लक्षणों में सुधार होता है तो संक्रमण के लक्षणों के आधार पर पर दवाओं से इलाज किया जाता है। लेकिन हमेशा याद रहे कि एंटीबायोटिक दवाओं का इलाज (course) कभी बीच में नहीं छोड़ना चाहिए।

गंभीर संक्रमण के लिए इलाज

अगर आपका किडनी संक्रमण एक गंभीर रूप ले चुका है तो आपको उसके इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है। यहाँ आपका इलाज इंजेक्शन के द्वारा किया जाता है और आपकी मेडिकल सेवाओं से जुड़े लोग जैसे नर्स आदि आपकी एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन का ध्यान रखते हैं।

किडनी में संक्रमण बार-बार होने के लिए इलाज

इसके अलावा आपका किडनी संक्रमण बार-बार वापस आ रहा है तो संभव है कि आपके मूत्र पथ की संरचना में समस्या हो सकती है। ऐसे में आपका डॉक्टर आपको मुत्रप्रणाली शास्त्रीचिकित्सक (Urologist) के पास जाने की सलाह दे सकता है। क्योंकि इस तरह की जटिलताओं के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

किडनी संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस) के लिए घरेलू इलाज (नुस्खे)

किडनी के संक्रमण में विशेषज्ञ के इलाज के साथ-साथ आप कुछ कामगर घरेलू नुस्खे भी अपना सकते हैं। लेकिन याद रहे कि नुस्खे भी विशेषज्ञ की सलाह या उससे पूछकर ही अपनाएँ। क्योंकि ये नुस्खे संक्रमण को रोक सकते हैं पूरी तरह ठीक नहीं कर सकते। क्या हैं वे घरेलू नुस्खे जो किडनी के संक्रमण में हो सकता है कामगर जानिए-

  • अगर आपको संक्रमण के कारण पेट के निचले दर्द है तो आप सिकाई कर सकते हैं इससे दर्द में आराम मिलता है।
  • शरीर में पानी की कमी न होने दें ज्यादा से ज्यादा पानी पिएँ। इससे आपको जल्दी-जल्दी पेशाब आएगा जिसके माध्यम से बैक्टीरिया बाहर निकल जाता है।
  • आराम करें।
  • जैसे ही पेशाब की तीव्र इच्छा हो तो तुरंत जाए। हर 2-3 घंटे में मूत्राशय को खाली करें।
  • क्रैनबैरी का जूस या उसके अर्क युक्त गोलियाँ लें।
  • असुरक्षित संभोग से बचें।
  • सम्भोग के बाद पेशाब करें
  • मल त्याग के बाद अपने को आगे से पीछे तक अच्छी तरह साफ करें।

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